गुरुवार, 2 जुलाई 2020

इंतज़ार...


... उसके इर्द गिर्द  बहुत समझदार लोग थे। सबने उससे कहा, किसी से मिल लेने चंद बाते ओर तमाम ख़्वाहिश.. को प्यार नहीं कहते। 
आज किसी से बात करते हुए चाहा कि मुनव्वर राना का वो शेर कहूँ,
'तमाम जिस्म को आँखें बना के राह तको ... तमाम खेल मोहब्बत में इंतिज़ार का है'। 

बदन के कैनवास पर कविता लिखी जाए या रंगी जाए?
एकदम पक्का होता है इंतज़ार का रंग। बारिश से नहीं धुलता, आँसुओं से भी नहीं।  बहुत दूर देश में एक विस्मृति की नदी बहती है। उसके घाट पर लगातार सोलह चाँद की रात में जा कर डुबकियाँ लगाने से थोड़ा सा फीका पड़ता है इंतज़ार का रंग। लेकिन ये इस पर भी निर्भर करता है कि रंगने वाले  की कूची का रंग कितना गहरा था उस वक़्त। अगर इंतज़ार का रंग गहरा है तो कभी कभी दिन, महीने, साल बीत जाते है। चाँद, नदी और आह से घुली मिली रातों के लेकिन इंतज़ार का रंग फीका नहीं पड़ता।
हाँ जब ओ मिले तुमसे तो मेरी  इक उलाहना दे देना, उसे  "मेरी शामों को इतने गहरे रंग के इंतज़ार से रंगने की ज़रूरत नहीं थी।"
@ मनीष द्विवेदी**
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